ऐसे कामयाब हुए मोदी सरकार और किसान नेता आंदोलन को खत्म करने

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दरअसल, 23 दिसंबर को जिस दिन दिल्ली पुलिस ने किसानों को परेड करने की इजाजत दी थी, उसी दिन मोदी सरकार ने किसान आंदोलन खत्म करने की रणनीति बना ली थी। दरअसल धरने को हटाने की हिम्मत सरकार इसलिए नहीं जुटा पा रही थी क्योंकि किसान पिछले दो महीने से शांतिपूर्ण धरना कर रहे थे और हिंसा की कोई घटना नहीं हुई थी। अभी तक किसान आंदोलन को लेकर जनसमर्थन हासिल था लेकिन 26 जनवरी की घटना के बाद दृश्य बदल गया। दिल्ली पुलिस ने इससे पहले किसानों को परेड की इजाजत देने से इंकार कर दिया था। सूत्रों का कहना है कि आंदोलन को खत्म करने की दोनों पक्षों की समझ के बाद परेड को करने की इजाजत दी गई।

सूत्रों की माने तो सरकार और किसान नेताओं की आपसी समझ के बाद आंदोलन को खत्म करने की रणनीति बनी। इसके लिए 26 जनवरी को चुना गया। किसान नेताओं पर भारी दबाव था कि वे आंदोलन को खत्म कर दें। लेकिन किसान नेता चाहते थे कि उनको आंदोलन खत्म करने का कोई रास्ता दिया जाएं, क्योंकि वे ऐसा दिखना नहीं चाहते थे कि वे सरकार के सामने झुकता हुआ दिखाई दें। इसलिए 26 जनवरी के दिन रणनीति बनाई गई। कई किसान नेताओं का आरोप है कि पुलिस ने भीड़ में कुछ लोगों को शामिल करवाया और इन लोगों ने हुड़दंग करवाने में अहम भूमिका निभाई। किसान नेता राकेश टिकैत का आरोप है कि भाजपा के लोगों ने आंदोलन में शामिल होकर हुड़दंग मचाया। नेताओं की माने तो पुलिस ने जिस रूट पर किसानों को टैªक्टर पर परेड करने की इजाजत दी थी। उसे बैरिकेड लगाकर बंद कर दिया। इससे किसान नेता खासकर युवाओं को गुस्सा आया कि उनके नेताओं ने जिस रूट पर उनको जाने को कहा था, उसे बंद कर दिया गया। इसमें कुछ लोगों ने आगे आकर बेरीकेट को गिराने का काम किया। किसान नेताओं का कहना है कि यह लोग पुलिस, प्रशासन या भाजपा के लोग थे, जिन्होंने भीड़ को उकसाया। हालांकि सवाल यह भी उठते है कि परेड की अगुवाई कर रहे किसान नेता आखिर क्यों परेड के दौरान पीछे रह गए। उन्होंने आगे आकर आखिर क्यों नहीं भीड़ को संभाला। किसान नेताओं का कहना है कि भीड़ में शामिल कुछ हुड़दंगियों ने जानबूझकर अपने टैªक्टर को तेजी से चलाकर आगे ले गए। वहीं सवाल उठ रहे है कि किसान नेताओं को जब डर था कि सरकार किसी भी सूरत में आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश कर सकती है तो आखिर क्यों टैªक्टर परेड पर किसान नेता अड़े थे।