कितना कारगर होगा, कोरोना से लड़ाई में लॉकडाउन-2

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चीन के वुहान शहर से निकला कोरोनावायरस ने दुनिया के 200 देशों की कमर तोड़ कर रख दी है। फिलहाल, कोरोना का कोई असरदार इलाज या वैक्सीन नहीं” है। इसलिए, दुनियाभर की सरकारें इसे रोकने के लिए एक ही तरीका अपना रही हैं और वो तरीका है- लॉकडाउन। इस लॉकडाउन के दौरान आईपीएल रद्द हुआ, बच्चों की परीक्षा केंसल हुई। ना जाने इस लॉकडाउन ने कितने लोगों का सपना चकनाचूर कर दिया। इस लॉकडाउन का सबसे ज्यादा असर अर्थव्यवस्था और शिक्षा पर पड़ा है क्योंकि देश का हर व्यापारी अपने-अपने घरों में लॉक है और इतना ही नहीं बच्चों के भविष्य पर भी तलवार लटक रही है, हालांकि बच्चों के उज्जवल भविष्य के बारे में सोचते हुए सरकार ने ऑनलाइन क्लासेज शुरू करवा तो दी हैं परन्तु कुछ बच्चों के भविष्य पर अभी भी खतरा मंडरा रहा है। जरा सोचिए जिन बच्चों के पास लैपटॉप और स्मार्टफोन नहीं हैं, वो छात्र ऑनलाइन क्लासेज के भागीदारी कैसे बन सकते है?

खैर वर्तमान की बात करें तो, कोरोना वायरस जैसी घातक बीमारी से बचाने के लिए देश के पीएम नरेंद्र मोदी ने भारत में 3 मई तक लॉकडाउन का ऐलान किया हुआ है हालांकि पहले लॉकडाउन 21 दिनों के लिए लगाया गया था, लेकिन बाद में इसे 19 दिन और बढ़ा दिया गया। लॉकडाउन का पहला फेज 25 मार्च से 14 अप्रैल के बीच लागू रहा और दूसरा फेज 15 अप्रैल से 3 मई तक रहेगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है क्या 3 मई के बाद लॉकडाउन खुल जाएगा? इस पर संदेह है..

लॉकडाउन बढ़ाने के पीछे तर्क था कि देश में कोरोना के मामले थम जाएंगे लेकिन कोरोना तो थमने का नाम ही नहीं ले रहा है और कम होने के बजाय करोना मरीज़ तादाद में बढ़ते जा रहे हैं। हालांकि एक रिसर्च के अनुसार, दुनिया में कोरोना 41% की ग्रोथ रेट से फैल रहा था। अगर सरकार की तरफ से शुरुआत में कोई एक्शन नहीं लिया जाता, तो इसी ग्रोथ रेट के हिसाब से 15 अप्रैल तक 8.2 लाख लोगों के संक्रमित होने की आशंका थी।

लॉकडाउन से पहले क्या हमारी हालत सामान्य थी?
देश में लॉकडाउन उस समय लगाया गया, जब कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या अचानक बढ़ने लगी थी। देश में कोरोना का पहला मामला 30 जनवरी को आया था। उसके बाद 2 फरवरी तक 3 मामले थे लेकिन, फिर पूरे महीनेभर कोई नया मामला नहीं आया। ये तीनों मरीज भी ठीक हो चुके थे। उसके बाद 2 मार्च से देश में कोरोना के मामले अचानक बढ़ने लगे। 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगाया गया और 25 मार्च से देशभर में संपूर्ण लॉकडाउन लागू हो गया। लॉकडाउन से एक दिन पहले तक यानी 24 मार्च तक देश में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या 571 थी। तब देश में 10 मौतें हो चुकी थीं। लॉकडाउन से पहले तक देश में कोरोना के मामले दिखने में भले ही कम लग रहे हों, लेकिन इनकी एवरेज ग्रोथ रेट 35% के आसपास थी। यानी, हर दिन कोरोना के 35% नए मरीज मिल रहे थे।

लॉकडाउन के पहले फेज में क्या सुधार और क्या खास?
लॉकडाउन लगने के बाद भी 25 मार्च से 14 अप्रैल के बीच देशभर में कोरोना के 10 हजार 919 नए मामले बढ़े। यानी, 14 अप्रैल तक देश में कोरोना के जितने मामले आए, उसमें से 95% मामले लॉकडाउन में आए। लेकिन, राहत की एक बात ये भी रही कि लॉकडाउन के दौरान कोरोना के नए मामलों की एवरेज ग्रोथ रेट में कमी आई। लॉकडाउन से पहले कोरोना की एवरेज ग्रोथ रेट 35% थी, जो लॉकडाउन में घटकर 15% रह गई।

इसको ऐसे भी समझ सकते है कि लॉकडाउन से पहले कोरोना की ग्रोथ रेट 35% थी। यानी, सोमवार को अगर कोरोना के 100 मरीज हैं, तो मंगलवार को मरीजों की संख्या 135 हो जा रही थी। लेकिन, लॉकडाउन में ग्रोथ रेट 15% कम हो गई। इसका मतलब हुआ कि, पहले मंगलवार को कोरोना संक्रमितों की संख्या 100 से 135 हो रही थी तो अब ये 100 से 115 ही बढ़ सकी।


परंतु राहत की एक बात ये भी कि लॉकडाउन में हर दिन औसतन 58 मरीज ठीक हुए। लॉकडाउन के पहले फेज में राहत की एक और बात रही और वो ये कि इस दौरान कोरोना के संक्रमण से ठीक होने वाले मरीजों की संख्या बढ़ी। 24 मार्च तक देश में 40 मरीज ही ठीक हुए थे। लेकिन 25 मार्च से 14 अप्रैल के बीच 1 हजार 325 मरीज ठीक हुए। अगर इसका औसत निकालें तो हर दिन 58 मरीज कोरोना से ठीक हुए। हैरान करने वाली बात यह भी रही कि लॉकडाउन के 21 दिन में 384 मौतें हुईं, हर दिन औसतन 18 मौतें की तादाद बढ़ते गई। यानी, हर दिन औसतन 18 मौतें हुई। जबकि, लॉकडाउन से पहले तक औसतन हर 5.5 दिन में एक मौत हो रही थी।