किसानों के खिलाफ सरकार की रणनीति थकाओ और इनको ही करो बदनाम

0
448

किसान आंदोलन का जोश बरकरार रखने के लिए किसान नेता रोज नए तरीके अपना रहे हैं लेकिन सरकार बिल्कुल पिघलने को तैयार नहीं है।

सरकार के रणनीतिकार मान कर चल रहे हैं कि आंदोलन करने वाले किसानों को पूरी तरह से थका दिया जाए और साथ ही आंदोलन को बदनाम करने की पूरी कोशिश की जाए।

सरकार का आकलन है कि सड़क पर दिल्ली और उसके आसपास के राज्यों के लोगों को आने जाने में परेशानी होने से इस आंदोलन को लेकर लोगों में गुस्सा बढ़ेगा।

साथ ही आंदोलन करने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं पर भी इसे आगे तक चलाने में दिक्कत आएगी।

सरकार के कई बड़े मंत्री मानकर चल रहे हैं कि कुछ दिनों में ही आंदोलन थक हार कर खुद ही खत्म हो जाएगा या फिर कोई सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आंदोलन को खत्म करने और इससे लोगों को हो रही परेशानियों के बारे में शिकायत कर सकता है और उसके बाद कोर्ट कोई महत्वपूर्ण आदेश दे सकता है जिसके आधार पर सरकार कोई कार्यवाही करेगी। इस साल की शुरुआत में दिल्ली के जामिया इलाके में हुए शाहीन बाग प्रदर्शन में भी सरकार ने इसी तरह की रणनीति अपनाई थी।

किसान आंदोलन को दिल्ली की सीमाओं पर जोर शोर से नेतृत्व करने वाले भी मान रहे हैं कि आने वाले दिनों में इसे आगे ले जाना बहुत मुश्किल है।

भले ही किसान कह रहे हो कि वह 6 महीने का राशन पानी लेकर आए हैं लेकिन सड़क पर एक एक दिन बिताना उनके लिए भारी पड़ रहा है। साथ ही किसान संगठनों की आपसी एकता को बनाए रखना भी बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।

कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़े रखने के लिए किसान संगठनों के नेता रोज नए तौर तरीके अपना रहे हैं।

कभी भारत बंद का ऐलान करते हैं तो कभी 1 दिन का उपवास रख रहे हैं ताकि सरकार के साथ-साथ जनता का भी ध्यान उनकी तरफ जाए लेकिन खुद प्रधानमंत्री समेत समूची सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह कानून तो कतई वापस नहीं लेने वाले।

वही आम जनता के बीच भी किसानों को लेकर बनी सहानुभूति को भी खत्म करने की कोशिश की जा रही है।

सरकार के बड़े मंत्री टीवी रेडियो और अखबारों में लगातार बयान दे रहे हैं कि किसान आंदोलन की वजह से दिल्ली और उसके आसपास के राज्यों के लोगों को आवाजाही में बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है इसलिए किसानों को अपना आंदोलन वापस लेना चाहिए।

दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों के लोगों को सुबह शाम भारी ट्रैफिक का सामना करना पड़ रहा है आधे घंटे का रास्ता तय करने 2- 2 घंटे लग रहे हैं।

वही सरकार सरकार के मंत्री बयान दे रहे हैं कि माओवादी, नक्सलवादी और खालिस्तानी समर्थक भी इस आंदोलन को समर्थन कर रहे हैं। कई बड़े अखबारों में इस संबंध में खुफिया सूत्रों की ओर से खबरें छपी हैं थी इस आंदोलन पर माओवाद और नक्सलवाद से जुड़े लोग इसे फंड दे रहे हैं।