केंद्र अब भी किसान आंदोलन को मान रहा है पंजाब की समस्या, चुनावी राज्यों पर नजर

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किसानों के लाल किले पर उग्र होने और हिंसा की घटनाएं के 1 महीने बाद भी सरकार और किसान संगठनों के बीच जमी बर्फ पिघल नहीं पाई है और दोनों पक्ष एक दूसरे की तरफ उम्मीद लगाए बैठे हैं कि वह पहले हथियार डालेंगे और गतिरोध तोड़ेंगे जबकि दोनों पक्षों के बीच पिछले 1 महीने से कोई बातचीत नहीं हुई है।

सरकार का मानना है कि 20 जनवरी को 18 महीने कानून को स्थगित रखने की पेशकश के बाद उसने गेंद किसानों के पाले में डाल दी है जबकि किसान सोच रहे हैं की सरकार एक कदम और आगे बढ़ेगी और आगे आकर उनसे बातचीत कर इस बारे में कोई संकल्प लेगी।

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा आंदोलन अपनी लोकप्रियता खो चुका है और अब लोग उसका समर्थन नहीं कर रहे हैं पंजाब के बाहर इसका लोगों पर कोई असर नहीं है यह समय के साथ खुद ही सुलझ जाएगा।

पिछले दांत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और पदाधिकारियों के साथ बैठक में किसान आंदोलन का मुद्दा उठा था।

बैठक में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का यही संदेश था कि 3 महीने से चले आ रहे दिल्ली की सीमाओं पर इस आंदोलन को भाजपा विरोधी तत्व हवा दे रहे हैं और पार्टी को जरूरत है कि किसानों को इससे दूर रखा जाए। बैठक में स्पष्ट संदेश था संकेत था की कानून वापसी का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता पार्टी ने इसके बाद अपने राजनीतिक प्रस्ताव को भी जारी किया और उसमें कानून का भरपूर समर्थन किया।

पार्टी हाईकमान यह संदेश देना चाहता है कि उसके शीर्ष नेता चुनावी राज्यों में जमकर प्रचार करेंगे और यह संदेश देंगे कि वह किसान आंदोलन से किसी भी तरह से परेशान नहीं है।
होगी अगर वह प्रतिरोध को खत्म करना चाहती हैं।