कोरोना और चीन की वजह से पुराना दोस्त रूस फिर वापस आ गया,

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कोविद -19 महामारी शुरू होने के बाद अपनी पहली विदेश यात्रा पर विदेश मामलों के मंत्री एस जयशंकर मंगलवार शाम को मॉस्को पहुँच रहे हैं। वह विदेश मंत्रियों की शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में भाग लेंगे, जहां वह अपने चीनी समकक्ष वांग यी के साथ भी आमने-सामने होंगे।

माना जा रहा है कि जय शंकर अपने चीनी समकक्ष से लद्दाख स्थित एलएसी पर हो रही भारत और चीनी सेना के टकराव को लेकर बातचीत करेंगे। भारत सरकार भी यही उम्मीद करती होगी कि इस बातचीत के बाद से सीमा पर तनाव खत्म होगा और वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी में स्थिति पहले की तरह शांति पूर्ण बनेगी।

पिछले हफ्ते ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मास्को से लौटे, जहां वह शंघाई सहयोग संगठन के रक्षा मंत्रियों की बैठक में भाग लेने गए थे। वह वहां अपने चीनी समकक्ष वेई फ़ेंग के साथ आमने-सामने आए। लेकिन लद्दाख के मुद्दे पर कोई बातचीत आगे बढ़ नहीं सकी।

इस सप्ताह के अंत में भारत और रूस ने बंगाल की खाड़ी में अपने 11 वें द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास का समापन किया , जिसे इंद्र नेवी कहा जाता है। इसमें विमान भेदी अभ्यास, फायरिंग अभ्यास, हेलीकॉप्टर संचालन और समुद्र में पुनःपूर्ति का प्रदर्शन किया गया।

मालाबार में भारत की झिझक

हालांकि भारत की ओर से औपचारिक रूप से ऑस्ट्रेलिया को मालाबार नौसैनिक अभ्यास में भाग लेने के लिए अमेरिका और जापान के साथ आमंत्रित करना बाकी है , भले ही इन देशों के विदेश मंत्री अगले महीने भारत सरकार के निमंत्रण पर दिल्ली में मिल रहे हों।

भारत की झिझक

ऐसा लगता है कि भारत चीन को अनावश्यक रूप से उत्तेजित नहीं करना चाहता, जो पहले से ही लद्दाख में आक्रामक रुख अपना रहा है। आस्ट्रेलियाई लोगों को आमंत्रित करने से यह संदेश जाएगा कि चार लोकतांत्रिक देश और अमेरिका के नेतृत्व में इंडो-पैसिफिक में उनकी अंतर-संचालन करने वाली नौसेना बीजिंग के खिलाफ काम कर रही है।

दरअसल यहां एक और संदेश मिल रहा है कि भारत सरकार मालाबार के मुद्दे को अभी फिलहाल स्थगित करके रखना चाहती है ताकि ताकि रूस नाराज ना हो और चीन के साथ लद्दाख संकट को खत्म करने में उसकी मदद कर सके। इसलिए, कुछ समय के लिए अमेरिका के नेतृत्व वाले मालाबार के मुद्दे को फिलहाल टालना ही ठीक समझा जा रहा है।

कोविद ने दरवाजे खोले

सूत्र बताते हैं कि वास्तव में भारत सरकार के रडार पर अभी रूस है और दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला अभी 1 सप्ताह पहले ही शुरू हुआ है जब रूस में भारत के राजदूत डीबी वेंकटेश वर्मा को मॉस्को के गामालेया रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ एपेडेमियोलॉजी एंड माइक्रोबायोलॉजी से एक कॉल आया, जिसमें पूछा गया कि क्या भारत कोरोनोवायरस के खिलाफ ‘स्पुतनिक वी’ वैक्सीन के संयुक्त शोध और उत्पादन में रुचि लेगा?

कोविड के बढ़ते मामलों के चलते भारत में ब्राजील को पीछे छोड़ दिया है ऐसे में भारत के राजदूत ने जैव प्रौद्योगिकी विभाग की सचिव रेनू स्वरूप के साथ रूसी अधिकारियों से संपर्क करवाया है। सूत्रों का कहना है कि भारत और अब रूस के साथ टीके के मोर्चे पर गहराई से लगे हुआ हैं।

और दोस्त रूस वापस आ गया है

बड़े लंबे अंतराल के बाद दिल्ली रूसियों को लेकर गर्म जोशी से विचार कर रही है। सिर्फ कोरोना वायरस को रोकने के लिए वैक्सीन के उत्पादन ही मकसद नहीं बल्कि भारत को यह लगता है कि रूसी एकमात्र ऐसी शक्ति है जो चीन के साथ मौजूदा विवाद को खत्म करने में उसकी मदद कर सकती है। सूत्रों का कहना है कि भारत सरकार को लगता है कि लद्दाख के संकट का कोई समाधान खोजने में रूस चीन के साथ बातचीत आगे बढ़ाने में उसकी मदद कर सकता है।

यहां यह भी याद रखना जरूरी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के अपने रूसी समकक्ष निकोलाई पेत्रुशेव के साथ मजबूत संबंध हैं। डोभाल ने पिछले साल अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के बाद मॉस्को की यात्रा की और पेत्रुशेव ने जम्मू-कश्मीर के भारत में एकीकरण पर समर्थन की पेशकश की ।

कोविद से संक्रमित इस नई दुनिया में आप नए विदेशी नीति के समीकरण बनाए जा रहे हैं और शीतयुद्ध की गंद इस माहौल में ज्यादा दूर तक नहीं फैल रही है।

अब ट्रंप के ऊपर पुतिन को तरजीह

ट्रंप और मोदी के बीच समीकरण से हालाकी इनकार नहीं किया जा सकता हाउदी मोदी और नमस्ते ट्रंप के उत्सव के दौरान देखा गया था कि किस तरह दोनों नेताओं ने दुनिया के सामने अपनी दोस्ती को दिखाया था।

व्लादीमीर पुतिन के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2 साल पहले बोट राइड की थी, उस समय वहां टीवी कैमरे नहीं थे इसलिए इसका पता नहीं लगा कि क्या हुआ था। सूत्रों का कहना है कि भारत इस बात को भलीभांति समझता है कि पुतिन ही दुनिया में ऐसे एकमात्र नेता हैं जिनका फोन चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सीधा उठाते हैं। और शायद इसलिए दिल्ली अब एक बार फिर मास्को के रास्ते चल पड़ी है।