कोरोना वायरस से त्राहि त्राहि, सालों का रिकॉर्ड तोड़ निचले स्तर पर पहुंचा कच्चा तेल!

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कोरोना वायरस ने अमेरिका समेत पूरे विश्व को त्रस्त कर दिया है। इससे एनर्जी सेक्टर बुरी तरह प्रभावित है। फैक्ट्री में कामकाज घटा है और एविएशन सेक्टर में मंदी के कारण कच्चे तेल के दाम ऐतिहासिक निचले स्तर पर हैं। जिससे डिमांड भी काफी कमी आई है और कीमत पर दबाव बढ़ गया है। इसके कारण क्रूड की मांग में भी भारी गिरावट आई है। सऊदी अरब और रूस के बीच प्राइस वॉर शुरू होने से तेल की कीमत गिरावट और गहरा गई। अमेरिकी तेल कंपनियों पर कर्ज का बोझ बैंकिंग और फाइनैंशल सेक्टर के लिए भी खतरा बन गया है। अगर कोई भी कंपनी दिवालिया होती है तो इससे अमेरिका की पूरी इकॉनमी पर असर होगा। हालांकि, इस महीने के शुरू में दोनों देशों तथा कुछ अन्य देशों ने मिलकर तेल की कीमत बढ़ाने के लिए उत्पादन में करीब 1 करोड़ बैरल रोजाना की कटौती करने का फैसला किया, लेकिन फिर भी लगातार कीमत में गिरावट जारी है।

कोरोना वायरस की वजह से वेस्ट टेक्सस इंटरमीडिएट (डब्लूटीआई) में फ्यूचर प्राइस पहली बार नेगेटिव में यानी -$3.70 प्रति बैरल के अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है।
अमेरिकी बेंचमार्क क्रूड वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) की कीमतों में इतिहास की सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिली। 34 साल बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि कच्चे तेल के भाव 0 यानी जीरो से भी नीचे चले गए हैं। भारत की निर्भरता ब्रेंट क्रूड की सप्लाई पर है, न कि WTI की। ब्रेंट का दाम अब भी 20 डॉलर के ऊपर बना हुआ है। गिरावट सिर्फ WTI के मई वायदा में दिखाई दी, जून वायदा अब भी 20 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर है। लिहाजा भारत पर अमेरिकी क्रूड के नेगेटिव होने का खास असर नहीं होगा। लेकिन कच्चे तेल के दाम से कैसे भारत पर असर पड़ता है यह जानना जरूरी है।

हालांकि, 1983 के बाद पहली बार ऑइल फ्यूचर प्राइस नेगेटिव हुआ है। 1983 में न्यू यॉर्क मर्केंटाइल एक्सचेंज ने ऑइल फ्यूचर की ट्रेडिंग शुरू की थी तब से पहली बार तेल की कीमत शून्य के नीचे पहुंची है। यह ऐसी स्थिति है जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। आइए जानतें हैं कि क्या है तेल का वायदा बाजार।

तेल की कीमतें मुख्य तौर पर 3 चीजों पर निर्भर करती हैं- डिमांड, सप्लाई और क्वॉलिटी। कोरोना वायरस की वजह से दुनियाभर में ज्यादातर जगहों पर लॉकडाउन है, ज्यादातर गाड़ियों के पहिये थमे हुए हैं, लिहाजा तेल की डिमांड बहुत कम है। आलम यह है कि सप्लाई सरप्लस की वजह से प्रोड्यूसर्स के पास तेल को स्टोर करने के लिए जगह की कमी पड़ती दिख रही है। ओवरफ्लो की स्थिति है। नेगेटिव प्राइस का मतलब है कि डिमांड से ज्यादा तेल होने की वजह से प्रोड्यूसर अब फ्यूचर ट्रेडर्स को तेल लेने के लिए पैसे देंगे।

भारत कच्चे तेल का बड़ा आयात
भारत कच्चे तेल का बड़ा इंपोर्टर है। खपत का 85 फीसदी हिस्सा आयात के जरिए पूरा किया जाता है। ऐसे में जब भी क्रूड सस्ता होता है तो भारत को फायदा होता है। तेल जब सस्ता होता है तो आयात में कमी नहीं पड़ती बल्कि भारत का बैलेंस ऑफ ट्रेड भी कम होता है। रुपये को फायदा होता है, डॉलर के मुकाबले उसमें मजबूती आती है और महंगाई भी काबू में आ जाती है। जाहिर है जब बाहर से सस्ता कच्चा तेल आएगा तो घरेलू बाजार में भी इसकी कीमतें कम रहेंगी।

ऐसे समझे कि कच्चे तेल के भाव में जब एक डॉलर की कमी आती है तो भारत के आयात बिल में करीब 29000 करोड़ डॉलर की कमी आती है। यानी 10 डॉलर की कमी आने से 2 लाख 90 हजार डॉलर की बचत। सरकार को इतनी बचत होगी तो जाहिर है पेट्रोल-डीजल और अन्य फ्यूल के दाम पर असर पड़ेगा।

रिटेल दाम पर कैसा असर होता है?
जब कच्चे तेल के दाम गिरते हैं तो पेट्रोलियम प्रॉडक्ट्स के दाम में भी गिरावट दर्ज की जाती है। यानी पेट्रोल और डीजल सस्ते हो सकते हैं। कच्चे तेल के दाम में एक डॉलर की कमी का सीधा-सीधा मतलब है पेट्रोल जैसे प्रॉडक्ट्स के दाम में 50 पैसे की कमी। इसी तरह यदि क्रूड के दाम 1 डॉलर बढ़ते हैं तो पेट्रोल-डीजल के भाव में 50 पैसे की तेजी आना तय माना जाता है।

मांग में ऐतिहासिक गिरावट के बाद तेल की कीमत पहली बार नेगेटिव हो चुकी है। अमेरिका में 20 अप्रैल को वेस्ट टेक्सस इंटरमीडिएट में मई महीने के फ्यूचर ट्रेडिंग में तेल की कीमत करीब -40 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई। इसका मतलब है कि प्रोड्यूसर अब तेल को ले जाने के लिए खरीदारों को पैसे देंगे। आइए कुछ पॉइंट्स में समझते हैं कि क्यों हुआ ऐसा और भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा।

क्यों नेगेटिव में हुआ दाम?
2019 के आखिर में चीन में कोरोना वायरस फैलने के बाद से ही ग्लोबल मार्केट में तेल की कीमत लगातार गिर रही है। बाद में वायरस चीन से बाहर फैलते हुए पूरी दुनिया को चपेट में ले लिया। जगह-जगह लॉकडाउन है, ज्यादातर जगहों पर ट्रांसपोर्ट तकरीबन बंद है इस वजह से तेल की डिमांड बहुत ही ज्यादा घट गई है। तेल की डिमांड पिछले 25 सालों में सबसे कम स्तर पर है। दूसरी तरफ ऑइल प्रोड्यूसर तेल कुंओं से उत्पादन जारी रखे हुए हैं। इस वजह से तेल की ओवर सप्लाई हुई और मांग व आपूर्ति का पूरा संतुलन ही गड़बड़ा गया।

‘नेगेटिव प्राइस’ का अर्थ क्या है?
‘नेगेटिव प्राइस’ का अर्थ होता है कि ऑइल प्रोड्यूसर के पास स्टोरेज के लिए जगह नहीं बची है लिहाजा वे तेल ले जाने पर उल्टे खरीदार को पैसे देंगे। सोमवार को अमेरिका में जो स्थिति थी उसके मुताबिक अगर कोई खरीदार तेल लेना चाहता है तो ऑइल प्रोड्यूसर उल्टे ऐसे खरीदारों को प्रति बैरल करीब 40 डॉलर चुकाएंगे। इसका असर यह होगा कि ऑइल प्रोड्यूसर अब प्रोडक्शन का काम रोक सकते हैं क्योंकि कोई भी तेल कंपनी अपने कच्चे तेल को घाटे में तो बिल्कुल नहीं बेचना चाहेगी। लिहाजा मुमकिन है कि ऑइल प्रोड्यूसर तब तक अपने कुंओं को बंद कर दें जब तक मार्केट रिकवर नहीं हो जाता।

यूएस में नेगेटिव प्राइस का भारत पर क्या असर होगा?
तेल के ओवरफ्लो की स्थिति अमेरिका में है। बाकी देशों में डिमांड जरूर कम है लेकिन ओवरफ्लो की स्थिति नहीं है। अमेरिका में प्रोड्यूसर हर दिन 1 करोड़ बैरल तेल का उत्पादन करते हैं। ऑइल स्टोरेज टैंक भर चुके हैं इसलिए कंपनियां सरप्लस तेल की किसी भी तरह बेचना चाहती हैं। बाकी देशों में तेल की कीमत कम हुई है लेकिन शून्य नहीं। भारत की बात करें तो WTI (वेस्ट टेक्सस इंटरमीडिएट) कीमतों से यहां सीधा कोई असर नहीं पड़ेगा। भारत की निर्भरता ब्रेंट क्रूड ऑइल पर है जो इंटरनैशनल बेंचमार्क ऑइल प्राइस है। ब्रेंट क्रूड अभी भी 25 डॉलर प्रति बैरल के स्तर के आस-पास है। इस साल जनवरी से लेकर ब्रेंट क्रूड की कीमत में करीब 2 तिहाई से ज्यादा गिरावट आ चुकी है और यह 18 वर्षों में सबसे कम कीमत है। जाहिर है, भारत को भी तेल सस्ते में मिल रहे हैं लेकिन शून्य के आस-पास वाली स्थिति नहीं है।

पेट्रोल, डीजल की कीमतों पर क्या होगा असर?
तेल की कीमतों के रसातल में जाने से इस साल पेट्रोल की कीमतों में तेजी से गिरावट होने वाली है। लेकिन पेट्रोल पंप पर अदा की जाने वाली कीमत भी ऑइल मार्केट की तरह ही होगी, इसे तो भूल ही जाइए। इसकी वजह है रिफाइनरी से पेट्रोल पंप तक के तेल के सफर के दौरान टैक्स, कमीशन और तेल कंपनियों का मुनाफा। भारत के संदर्भ में इसे देखे तो ऑइल प्रोड्यूसर से कच्चा तेल खरीदा गया। अब इससे रिफाइनरी पेट्रोल, डीजल और दूसरे पेट्रोलियम प्रोडक्ट निकालती हैं। यहां तेल कंपनियां अपना मुनाफा वसूलने के बाद तेल को पेट्रोल पंप तक पहुंचाती हैं। अब पेट्रल पंप मालिक प्रति लीटर तयशुदा कमीशन भी लेता है। रिटेल प्राइस में एक्साइज ड्यूटी और वैट और सेस भी जुड़ता है जिससे उपभोक्ता को अपनी काफी जेब ढीली करनी पड़ती है।

अब भारत में पेट्रोल पंप तक पहुंचते-पहुंचते कैसे इतनी बढ़ जाती है कीमत?
इसे हम ऐसे समझ सकते है कि रिफाइन करने के बाद तेल कंपनियां चार्ज लेकर तेल को आगे बढ़ाती हैं। पिछले महीने तक भारत में तेल कंपनिया पेट्रोल पर प्रति लीटर करीब 14 रुपये और डीजल पर प्रति लीटर करीब 17 रुपये चार्ज ले रही थीं। अब इस पर एक्साइज ड्यूटी और रोड सेस लगता है। पिछले महीने पेट्रोल पर यह प्रति लीटर करीब 20 रुपये और डीजल पर करीब 16 रुपये था। इसके बाद नंबर आता है पेट्रोल पंप मालिक के कमीशन का। वे पेट्रोल पर प्रति लीटर 3.55 रुपये और डीजल पर 2.49 रुपये कमीशन लेती हैं। इन सबके ऊपर फिर वैट लगता है। दिल्ली में पेट्रोल-डीजल पर 27 प्रतिशत वैट है। इस तरह क्रूड ऑइल से रिटेल में आते-आते तेल की कीमत करीब 3 से 4 गुना बढ़ जाती हैं।

क्या है वायदा कारोबार
ट्रेडर के भविष्य की जरूरतों में ध्यान रखकर सौदा करने वाले को वायदा कारोबार कहते हैं। इसमें एकमुश्त कीमत नहीं दी जाती बल्कि भविष्य में किसी तारीख को एक्सपायरी डेट तय किया जाता है। एक्सपायरी तारीख आने तक ट्रेडर को अपना सौदा क्लियर करना होता है।

WTI में तेल की कीमत नेगेटिव हुई है, वह फ्यूचर प्राइस ही है। फ्यूचर ट्रेडिंग एक महीने के लिए होती हैं।फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट किसी चीज जैसे कच्चे तेल, सोना या जिंस को खरीदने या बेचने के लिए भविष्य की किसी तारीख के लिए कीमत तय करने का एक अग्रीमेंट है। अमेरिका में क्रूड ऑइल की फ्यूचर ट्रेडिंग न्यू यॉर्क मर्केंटाइल एक्सचेंज (NYMEX) के माध्यम से होती है। यह कई तरह से होती है लेकिन इनमें से दो मुख्य हैं- क्रूड ऑइल फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट (CL) और ई-मिनी क्रूड ऑइल फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट (QM)। पहले यानी CL में 1,000 बैरल तेल का सौदा होता है जबकि QM 500 बैरल में।

मई महीने की डिलीवरी के लिए तेल सौदे का 21 अप्रैल यानी मंगलवार को आखिरी दिन है, लेकिन उम्मीद के मुताबिक तेल की मांग नहीं होने की वजह से तेल की कीमतों में भारी गिरावट देखी गई। इसे आप इस तरह से समझ सकते हैं कि कोई दुकानदार अपना स्टॉक खाली करने के लिए सामान को सस्ता कर दे।

अमेरिका में तेल के ओवरफ्लो की स्थिति
दरअसल, अमेरिका के पास एक तरह से कच्चे तेल का भंडार क्षमता से अधिक हो चुका है। वहां स्टोरेज सुविधाएं अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुंच चुकी हैं। एस-एंड-पी ग्लोबल प्लैट्स के मुख्य विश्लेषक क्रिस एम. के अनुसार, तीन सप्ताह के भीतर कच्चे तेल के सभी टैंक भर जाएंगे। ऐसे में आगे तेल उत्पादन के लिए जरूरी है कि मौजूदा भंडार को खाली किया जाए।

पहली बार निगेटिव पहुंचा रेट
एक तरफ तो अमेरिका के पास तेल रखने की जगह नहीं बच रही है। दूसरी तरफ कोरोना वायरस संकट के कारण मांग घटने से कोई व्यापारी फिलहाल कच्चा तेल खरीदकर उसे अपने पास रखने की स्थिति में नहीं है। जिस वजह से कारोबार में वॉल स्ट्रीट में शेयर भी लुढ़क गए। एस-एंड-पी 500 में 0.9 प्रतिशत की गिरावट आई। लेकिन सबसे ज्यादा ड्रामा कच्चा तेल के बाजार में हुआ।

कोरोना वायरस महामारी के कारण मांग में भारी गिरावट से अमेरिकी बेंचमार्क क्रूड वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) ने सोमवार को अब तक के इतिहास में अपना सबसे बुरा दिन देखा। कारोबार की शुरुआत 18.27 डॉलर प्रति बैरल से हुई और घटते-घटते पहले एक डॉलर के निम्नतम स्तर पर पहुंच गई और मार्केट क्लोज होते-होते यह निगेटिव में पहुंच गई। सोचने वाली बात यह है कि कच्चे तेल का भाव अमेरिका में एक कप कॉफी से भी सस्ता हो गया है, क्योंकि वहां स्टारबक्स में एक कप कॉफी 3-4 डॉलर में मिलती है। ब्रेंट क्रूड की कीमत 6.3% की गिरावट के साथ 26.32 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई। इस बीच आईएनजी के कमोडिटीज स्ट्रैटिजी के हेड वॉरेन पैटरसन का कहना है कि, ‘मई का कॉन्ट्रैक्ट आज समाप्त होने वाला है और जून के कॉन्ट्रैक्ट में पहले से ही काफी ज्यादा तेल बचा हुआ है।’ अमेरिका की स्टोरेज फैसिलिटीज खासकर ओकलहोमा में तेल की मात्रा बढ़ रही है, क्योंकि रिफाइनर्स कम मांग की समस्या से जूझ रहे हैं। ऑइल मार्केट्स के हेड जॉर्नर टॉनहाउगन ने कहा, ‘उत्पादन जारी रहने से भंडार जल्द ही भर जाएगा। कोरोना जैसा वायरस के वजह से दुनिया में तेल की खपत बहुत तेजी से घटी है और इसका असर तेल की कीमतों पर देखने को मिल रहा है।’

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