क्या अब किसानों का हठ उचित है?

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क्या अब किसानों का हठ उचित है?

कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन को खत्म करने और बीच का रास्ता निकालने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बेहतरीन पहल की है। मंगलवार को शीर्ष अदालत ने सभी पक्षों से वार्ता के लिए चार सदस्यीय कमेटी के गठन की घोषणा की है। इससे भी बढ़ कर वार्ता जारी रहने तक तीनों कृषि कानूनों पर स्थाई रोक लगा दी है। किसान आंदोलन के कारण जिस प्रकार के खतरनाक हालात बने थे, उसे देखते हुए शीर्ष अदालत की ओर से इससे बेहतर पहल नहीं हो सकती थी। सीधे-सीधे कहें तो शीर्ष अदालत ने तीनों कानूनों और किसान आंदोलन पर सरकार को बड़ा झटका दिया है।सुप्रीम कोर्ट ने वर्तमान हालात के लिए सीधे-सीधे सरकार को जिम्मेदार ठहराया। साफ तौर पर कहा कि सरकार ने बिना व्यापक विमर्श के कानून लागू कर दिया। यह भी कहा कि आंदोलन के कारण खतरनाक स्थिति बन रही है और इस मामले में सुप्रीम कोर्ट किसी तरह की हिंसा की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता। पूर्व की राय के अनुरूप सुप्रीम कोर्ट ने कानून लागू करने पर अस्थाई रूप से रोक लगा दिया।हालांकि यहां सवाल दूसरा है। सवाल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद आंदोलनरत किसान संगठनों का हठी रवैया है। किसान संगठन कह रहे हैं कि वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटी के सामने पेश नहीं होंगे। तर्क यह है कि उसकी मांग इन कानूनों को वापस लेने की थी। जबकि सुप्रीम कोर्ट परोक्ष रूप से कानून के प्रावधानों पर ही किसान संगठनों को बातचीत के लिए बाध्य करना चाहता है। किसान संगठनों का कहना है कि कमेटी के सामने पेश होने से उनकी कानून वापसी की मुख्य मांग दब जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार की सुनवाई में कहा है कि वह कानून पर रोक लगाने नहीं जा रही, बल्कि वह विवाद को खत्म करना चाह रही है।सवाल है कि क्या किसान संगठनों का यह रवैया उचित है? अगर किसान संगठन अपने इसी रवैये पर अड़े रहे तो क्या होगा? जाहिर तौर पर किसान संगठनों के इस हठी रवैये को स्वीकार नहीं किया जा सकता। वह इसलिए कि ठंड और कई अन्य कारणों से अब तक 70 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। भविष्य में आंदोलन जारी रहने पर मृतकों की संख्या और बढ़ेगी ही। आंदोलन में बड़ी संख्या में बुजुर्ग, औरतें और बच्चे शामिल हैं। जाहिर तौर पर आंदोलन लंबा खिंचने से इनकी परेशानी बढ़ेगी।फिर सवाल है कि किसान संगठन अपनी मांग पर बलपूर्वक सहमति की मुहर नहीं लगवा सकता। लोकतंत्र में वार्ता से ही समस्या का हल निकाला जाता है। सरकार के हठी रवैये के कारण सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी अंतिम आदेश के जरिए इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। किसान संगठनों को चाहिए कि वह सुप्रीम कोर्ट की बनाई कमेटी के समक्ष अपनी बात रखें। कानूनों और इससे जुड़े प्रावधानों पर अपना विरोध जताएं। कमेटी के समक्ष यह कहें कि तीनों के तीनों कानून कृषि और किसान के लिए खराब हैं। कमेटी के समक्ष किसान संगठनों को अपनी बात रखने से कोई नहीं रोक सकता।सुनवाई के दौरान भी किसानों की ओर से पेश अधिवक्ता ने कमेटी गठित किए जाने का विरोध किया। अधिवक्ता शर्मा ने कहा कि किसान संगठन कमेटी गठित किए जाने के पक्ष में नहीं हैं। किसान संगठन किसी समिति के समक्ष पेश होना नहीं चाहते। इस पर शीर्ष अदालत ने कहा कि जब किसान संगठन सरकार के समक्ष जा सकते हैं तो उन्हें समिति के समक्ष जाने में परहेज नहीं होना चाहिए। अदालत समस्या का समाधान चाहती है। हम यह नहीं सुनना चाहते कि किसान संगठन समिति के समक्ष पेश नहीं होंगे।किसान संगठनों को समझना होगा कि अभी लोगों और अदालत में इस आंदोलन के प्रति सहानुभूति है। दोनों ही पक्ष मामले को विवादास्पद बनाने के लिए सरकार को जिम्मेदार मान रहे हैं। अब जबकि समस्या का हल निकालने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने समिति बना दी है, तब ऐसे में किसान संगठनों का यह रवैया आंदोलन और उनकी मांग को कमजोर करेगा। किसान संगठन लोगों और अदालत की सहानुभूति खो देंगे। फिर यह धारणा मजबूत होगी कि आंदोलन कर रहे किसान संगठनों की समस्या का हल निकालने में कोई दिलचस्पी नहीं है। जाहिर तौर पर अगर ऐसी धारणा बनी तो यह किसान संगठनों के लिए कई तरह की समस्या खड़ी करेगी।किसान संगठनों को समझना होगा कि खुद सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले में भूमिका को ले कर सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। सरकार की एक भी दलील शीर्ष अदालत ने स्वीकार नहीं की है। उसे सुनवाई के दौरान हर मुद्दे पर डांट सुननी पड़ी है। सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार के न चाहते हुए भी सुप्रीम कोर्ट ने तीनों कानूनों पर अस्थाई तौर पर रोक लगा दी है। इसका सीधा सा अर्थ है कि शीर्ष अदालत भी मान रही है कि तीनों नए कानून में कई खामियां हैं। सुप्रीम कोर्ट ने किसान आंदोलन को भी जायज ठहराते हुए आंदोलन पर रोक लगाने से दो टूक शब्दों में इंकार किया है।अब ऐसी स्थिति में किसान संगठनों को समाधान का अंग बनना चाहिए। उनका वर्तमान रवैया यह धारणा बनाएगा कि किसान संगठन वास्तव में समाधान का नहीं बल्कि समस्या का अंग हैं। किसान संगठनों को पता है कि सरकार वैसे भी इस आंदोलन के खिलाफ युद्घ स्तर पर दुष्प्रचार कर रही है। ऐसे में किसानों का वर्तमार रवैया सरकार के दुष्प्रचार को मजबूती देगा।बेहतर होगा कि किसान संगठन अपने फैसले पर पुनर्विचार करे। सुप्रीम कोर्ट के द्वारा बनाई गई कमेटी के समक्ष अपनी आपत्तियां दर्ज कराए। इससे किसान और किसान संगठनों के प्रति देश में सकारात्मक माहौल बनेगा। जाहिर तौर पर लोकतंत्र में विरोध, हड़ताल, धरना जरूरी है। मतभेद के बिना स्वस्थ लोकतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती। मगर मतभेद बेहतर कल बनाने के लिए होना चाहिए, न कि वर्तमान की समस्या को और जटिल बनाने केलिए। जाहिर तौर पर लोकतंत्र में हर समस्या का समाधान चर्चा है। इसका सम्मान करते हुए किसान संगठनों को सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करना होगा। समस्या खत्म करने का यही एक अंतिम उपाय है।