टाइमटेबल, टेक्नोलॉजी और लॉकर- बच्चों के बस्ते का बोझ कम करना कैसे सुनिश्चित कर रहे हैं स्कूल

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सरकार की स्कूल बैग पॉलिसी के साथ छात्रों के बस्ते के बोझ का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है जिसमें बस्ते का बोझ विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों के औसत वजन से 10% से अधिक न रखने की पाबंदी लगाई गई है.

बेहतर ढंग से व्यवस्थित टाइमटेबल, जहां संभव हो डिजिटल सामग्री पर निर्भरता और लॉकर— ये कुछ ऐसे उपाय हैं जिन्हें पूरे देशभर के स्कूल पिछले कुछ सालों से अपना रहे हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि छात्रों को भारी भरकम बस्ते का बोझ उठाने को मजबूर न होना पड़े.

हमेशा से ही माता-पिता और शिक्षा विशेषज्ञों की चिंता का विषय रहा भारी स्कूल बैग का मुद्दा पिछले साल नवंबर में केंद्र सरकार की अपनी ‘स्कूल बैग पॉलिसी’ जारी किए जाने के बाद से एक बार फिर सुर्खियों में है.

इस नीति के तहत स्कूल बैग का वजन विभिन्न उम्र में बच्चों के औसत वजन के 10 फीसदी से ज्यादा न रखने का प्रावधान किया गया है, साथ ही स्कूलों से कहा गया है कि हर तीन महीने में निरीक्षण कराएं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह निर्धारित सीमा से ज्यादा नहीं है.

दिप्रिंट से बातचीत के दौरान विभिन्न स्कूलों ने बस्ते का बोझ कम ही रखने के लिए अपनी तरफ से उठाए गए कदमों की जानकारी दी, साथ ही यह भी बताया कि सरकारी नीति के मद्देनज़र वह इसके लिए और क्या योजना बना रहे हैं.

इस संदर्भ में सरकारी और निजी दोनों ही तरह के स्कूलों में अलग-अलग उपाय किए जा रहे हैं जिसमें सभी संस्थान इस पर जोर दे रहे हैं कि स्कूल आते-जाते समय छात्रों को ज्यादा बोझ न उठाना पड़े.

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‘भारी बैग से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं संभव’
गुरुग्राम स्थित हेरिटेज एक्सपेरिएंटियल लर्निंग स्कूल की प्रिंसिपल नीना कौल का कहना है कि ‘एक विश्वसनीय रिसर्च संस्थान इसकी पुष्टि करता है कि भारी स्कूल बैग के कारण बच्चों की पीठ पर पड़ने वाला अत्यधिक वजन शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है.’

उन्होंने आगे जोड़ा, ‘इस शारीरिक बोझ के कारण युवा दिमागों में होने वाला तनाव अक्सर बच्चों की सीखने की पूरी प्रक्रिया बोझिल मानने वाला बना देता है. ऐसे में वह लर्निंग को एक अनमोल उपहार समझने के बजाये इसे एक ड्यूटी जैसा अधिक मानने लग सकते हैं.’

‘यही वजह है कि हम छात्रों के बैग के वजन को लेकर हमेशा बेहद संवेदनशील रहे हैं.’

कौल के अनुसार, हेरिटेज एक्सपेरिएंटियल लर्निंग स्कूल में प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के छात्रों को टेक्स्टबुक साथ लेकर आना जरूरी नहीं है— वे केवल वर्कशीट लेकर आते-जाते हैं और इसलिए स्कूल बैग का वजन हल्का रहता है.

उन्होंने बताया, ‘नतीजा यह है कि प्राथमिक और माध्यमिक वाले हमारे छात्रों के पास कोई टेक्स्टबुक नहीं है और उन्हें एक निर्धारित संख्या में केवल एक्सरसाइज और वर्कशीट लाने की ही जरूरत होती है, ताकि उनके बैग का बोझ कम रहे. सीनियर-क्लास के छात्रों को अपनी किताबें रखने के लिए लॉकर दिए जाते हैं ताकि उन्हें हर दिन अपनी सारी किताबें न लानी पड़ें.’

दिल्ली पब्लिक स्कूल बैंगलोर भी छात्रों के लिए लॉकर के उपयोग को प्रोत्साहित करता है. स्कूल के शिक्षक माता-पिता से भी यह सुनिश्चित करने का अनुरोध करते हैं कि छोटे बच्चों को वे सिर्फ उन्हीं किताबों के साथ भेजें जो उनके टाइमटेबल के अनुसार जरूरी हों.

दिल्ली पब्लिक स्कूल (डीपीएस) बैंगलोर और मैसूर के प्रबंधन बोर्ड के सदस्य मंसूर अली खान ने कहा, ‘शिक्षकों के रूप में हम महसूस करते हैं कि भारी बैग उठाने वाले बच्चों पर इसका प्रतिकूल असर पड़ता है. हम माता-पिता को सलाह देते हैं कि बच्चों को स्कूल भेजते समय केवल वही किताबें दें जो टाइमटेबल में निर्धारित हैं.’

उन्होंने कहा, ‘…यही नहीं कई ऐसे स्कूल भी हैं जो छात्रों के लिए लॉकर सुविधा देते हैं ताकि उन्हें किताबें न लानी पडें.’

खान ने कहा कि उन्होंने टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल की कोशिश भी की थी.

उन्होंने कहा, ‘हमने कुछ किताबों को टैबलेट से बदल दिया और इस पर हमें आलोचना का सामना करना पड़ा, इसलिए इन सारी स्थितियों में सबसे उपयुक्त समाधान यही है कि माता-पिता बच्चे के बैग की जांच करें. बच्चे को सभी किताबें लेकर आने की आवश्यकता नहीं है, केवल वही लानी होती हैं जिनकी जरूरत है.’

भुवनेश्वर स्थित ओडीएम पब्लिक स्कूल का कहना है कि नई नीति उन कदमों से बहुत ज्यादा अलग नहीं है जो बस्ते का बोझ घटाने के लिए पहले से ही उठाए जा रहे हैं.

ओडीएम पब्लिक स्कूल के डायरेक्टर स्वायन सत्येंदु ने कहा, ‘हमें विभिन्न कक्षाओं के लिए विषयों के अनुसार एक निश्चित टाइमटेबल सुनिश्चित करना होगा. हम छात्रों से स्कूल में टेक्स्टबुक के बजाये ज्यादा से ज्यादा वर्कशीट लाने को कहते हैं. हमने उन्हें स्कूल में अपना सामान रखने के लिए लॉकर दिए हैं.’

टेक्नोलॉजी पर निर्भरता
यद्यपि प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल डीपीएस बैंगलोर और मैसूर के लिए आलोचना का सबब बन गया था लेकिन कई अन्य स्कूल छात्रों के बस्ते का बोझ घटाने के लिए इस दिशा में सफलतापूर्वक आगे बढ़ चुके हैं.

कानपुर स्थित सेठ आनंदराम जयपुरिया स्कूल की प्रिंसिपल शिखा बनर्जी ने कहा, ‘हमने बस्तों का वजन घटाने के लिए पहले ही उपयुक्त कदम उठाए हैं. इसका श्रेय प्रौद्योगिकी के विकास को भी जाता है क्योंकि बहुत सारा लर्निंग मैटीरियल डिजिटल रूप से उपलब्ध है. और हम छात्रों को लर्निंग के नए डिजिटल तरीके अपनाने और स्कूल में कम से कम किताबें लाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं.’

उन्होंने कहा, ‘इसके अतिरिक्त हम इस तरह का टाइमटेबल भी निर्धारित करते हैं जिसमें स्कूल लाने के लिए जरूरी पाठ्य सामग्री का वजन निर्धारित सीमा से ज्यादा न हो.’

दिल्ली के शालीमार बाग स्थित मॉडर्न पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल अलका कपूर इस बात से सहमत हैं कि प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से अतिरिक्त स्कूली किताबों का बोझ कम होगा.

उन्होंने कहा, ‘बैग के वजन पर नज़र रखने के साथ स्कूल डिजिटल डायरी का सहारा ले सकते हैं और किसी भी मुद्दे पर माता-पिता के साथ संवाद के लिए ऑनलाइन मोड का इस्तेमाल कर सकते हैं. ये काफी सुविधाजनक होने के साथ-साथ डायरी के वजन को भी कम करेगा. साथ ही, नई नीति में की गई सिफारिशों के अनुसार, स्कूल के अधिकारी हर शैक्षणिक वर्ष की शुरुआत में एक बैठक करेंगे और कक्षा 1 से 12 तक के लिए प्रतिदिन स्कूल लाने के लिए आवश्यक टेक्स्टबुक का वजन निर्धारित करेंगे.

उन्हें लगता है कि एक निश्चित टाइमटेबल निर्धारित होने से यह सुनिश्चित हो सकेगा कि छात्र अपने बैग में ज्यादा टेक्स्टबुक लेकर न आएं. उन्होंने कहा, ‘यही वजह है कि हम बेहतर व्यवस्थित टाइमटेबल बनाते हैं. ताकि यह सुनिश्चित हो पाए कि छात्र पर बस्ते का अनावश्यक बोझ न पड़े.’

सरकारी स्कूल भी नई नीति का पालन करने के लिए निर्धारत टाइमटेबल पर ही ज्यादा भरोसा कर रहे हैं क्योंकि वे न तो लॉकर्स की सुविधा प्रदान कर सकते हैं और न ही टैबलेट जैसी डिजिटल तकनीक पर अधिक निर्भरता बढ़ा सकते हैं.

हरियाणा के एक सरकारी स्कूल में माध्यमिक विद्यालय की शिक्षिका सोनम गुप्ता ने कहा, ‘हम अपने छात्रों को लॉकर या टैबलेट नहीं दे सकते हैं, इसलिए हम हर दिन स्कूल लाने के लिए जरूरी किताबों की संख्या को ध्यान में रखकर टाइमटेबल तय करेंगे.’

उन्होंने कहा, ‘टाइमटेबल को और भी ज्यादा व्यवस्थित करना होगा ताकि हर कक्षा के छात्रों के लिए बस्ते का बोझ सीमित रहना सुनिश्चित हो सके.’

दिल्ली के सरकारी स्कूल की एक अन्य टीचर ने कहा, ‘हम हर दिन छात्रों को एक सटीक टाइमटेबल देते हैं और उनसे उसके हिसाब से ही किताबें लाने को कहते हैं. हम इसी तरह से बच्चों के स्कूल बैग को हल्का रखना सुनिश्चित करते हैं.’

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