टैक्स देने से लोग कर रहे परहेज, सरकार को बहुत कम मिला टैक्स, अर्थव्यवस्था अभी भी लंगड़ा रही, पटरी पर आने में लगेगी कुछ और तिमाहियां

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काम धंधे बंद होने की वजह से सरकार का टैक्स कलेक्शन काफी कम हो गया है। देश के बड़े भाग में लॉक डाउन खुलने के बाद में हालात सुधरे नहीं है।

20 अगस्त तक की प्राप्तियों के आंकड़ों के मुताबिक देश के प्रमुख शहरों में कर संग्रह में दो अंकों की गिरावट दर्ज की गई है।

कोलकाता दिल्ली और चेन्नई से सबसे कम टैक्स

कोलकाता में 60 प्रतिशत की कमी आई है। उसके बाद चेन्नई और दिल्ली में क्रमश: 41 प्रतिशत और 36 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

बहरहाल मुंबई सबसे कम प्रभावित शहर है, हालांकि यहां भी संग्रह घटा है। कुल प्रत्यक्ष कर संग्रह में मुंबई की हिस्सेदारी 34 प्रतिशत है, जहां कोविड-19 के लगातार मामले बढऩे के बावजूद कर संग्रह महज 13 प्रतिशत घटा है।

सिर्फ बेंगलुरु से मिला ज्यादा टैक्स

टेक सिटी बेंगलूरु एकमात्र शहर है, जहां कर संग्रह 10 प्रतिशत बढ़कर 30,777 करोड़ रुपये रहा है। इसके अलावा गुवाहाटी मे कर संग्रह 4.7 प्रतिशत बढ़कर 1,212 करोड़ रुपये रहा है, जो पिछले साल की समान अवधि में 1,158 करोड़ रुपये था।

20 अगस्त तक प्रत्यक्ष कर के शुद्ध संग्रह में 26.3 प्रतिशत की कमी आई है और यह पिछले साल की समान अवधि में हुए 2,56,480 करोड़ रुपये की तुलना में घटकर 1,88,985 करोड़ रुपये रह गया है।

सितंबर तिमाही में भी कब मिलेगा टैक्स

सितंबर तिमाही में भी यह गिरावट जारी रह सकती है। जो चिंता का विषय है। पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में प्रत्यक्ष कर संग्रह 25.3 प्रतिशत गिरकर 1,25,065 करोड़ रहा था।

अन्य बड़े शहरों जैसे हैदराबाद, पुणे, चंडीगढ़, अहमदाबाद में भी इस साल 20 अगस्त तक की कर प्राप्तियों में 30 से 45 प्रतिशत तक की भारी कमी आई है।

सरकार की चिंता बढ़ी कैसे होंगे खर्चे पूरे

इन आंकड़ों ने सरकार के समक्ष कड़ी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं क्योंकि वित्त मंत्रालय ने इस वित्त वर्ष में 13.2 लाख करोड़ रुपये कर संग्रह का लक्ष्य रखा था।

अर्थव्यवस्था अभी भी लंगड़ा रही है और इसे पटरी पर आने में कुछ और तिमाहियां लगेंगी। लंबी बंदी की वजह से ज्यादातर कारोबार प्रभावित हुए हैं। ऐसे में अग्रिम कर संग्रह में सुधार तभी होगा, जब धीरे धीरे कारोबार पटरी पर आएगा। अग्रिम कर संग्रह में सुधार में वक्त लग सकता है।

इंडस्ट्री को नकदी का संकट

उद्योग जगत का मानना है कि अग्रिम कर/कॉर्पोरेट कर के संग्रह में कमी से संकेत मिलता है कि उद्योगों पर दबाव है और नकदी का मसला बना हुआ है।