तेजस्वी का पार्टी और परिवार पर नियंत्रण, विरोधी भी मान रहे पहले से ज्यादा समझदार लग रहे तेजस्वी

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बिहार के चुनाव से पहले तेजस्वी यादव ने राष्ट्रीय जनता दल और अपने परिवार पर पूरा नियंत्रण कायम कर लिया है। यहां तक कि पार्टी के कई नेता और उनके विरोधी भी कह रहे है कि तेजस्वी पहले से ज्यादा समझदार और परिपक्व नजर आ रहे हैं। पार्टी और लालू परिवार के अंदर अब उनका फैसला ही अंतिम माना जाता है। शायद इसकी वजह लालू यादव भी हैं, जिन्होंने पार्टी के नेताओं से लेकर अपने परिवार के सदस्य खासकर बेटे तेज यादव और मीसा भारती व पत्नी राबड़ी को भी कह दिया कि पार्टी में तेजस्वी के शब्द ही अंतिम माने जाएंगे।

राजद के नेताओं का कहना है कि पार्टी के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बेटे तेज प्रताप यादव और बेटी मीसा माने जाते हैं लेकिन लालू के भरोसे के बाद तेजस्वी ने काफी हद तक इन दोनों पर भी नियंत्रण पा लिया है। इसका असर टिकट बंटवारे में भी देखने को मिला।

गजब का सीन

सूत्रों ने बताया कि करीब 2 हफ्ते पहले जब तेजस्वी यादव महागठबंधन की सीटों के बंटवारे को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे तब अचानक उनको खबर मिली थी उनके भाई तेज प्रताप यादव बेहोश हो गए हैं। खबर सुनकर तेजस्वी तुरंत अपने भाई के घर पहुंचे लेकिन पता चला कि तेज बहाना बना रहे थे और इस बात से नाराज थे कि उनके 5 समर्थकों को पार्टी टिकट नहीं दे रही है। तेजस्वी ने तेज को साइड में ले जाकर बात की और कुछ देर में तेज माने ही नहीं बल्कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी तेजस्वी के बगल में बैठने को राजी हो गए।

यह वही तेज थे जिन्होंने लोकसभा चुनावों में पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ अपने पांच उम्मीदवार उतार दिए थे, यहां तक की सारण सीट से पार्टी के उम्मीदवार चंद्रिका राय जो उनकी पूर्व पत्नी ऐश्वर्या के पिता भी है, उनके खिलाफ प्रचार भी किया था। वहीं जहानाबाद में तेज के उम्मीदवार को इतने ज्यादा वोट मिले कि राजद का उम्मीदवार हार ही गया।

तेजस्वी ने तेज प्रताप के 5 समर्थकों को टिकट नहीं देने की मांग नहीं मानी लेकिन वह समस्तीपुर गए जब तेज प्रताप हसनपुर सीट से नामांकन भर रहे थे।

मीसा के भी सामने झुकने से इंकार

वही मीसा भारती के सामने भी तेजस्वी ने झुकने से इनकार कर दिया क्योंकि उन्होंने अपनी बहन की उस बात को नहीं माना जिसमें उन्होंने मानेर के विधायक विरेंद्र यादव का टिकट काटने की मांग की थी क्योंकि मीसा का कहना था कि 2019 के लोकसभा चुनाव ने उन्हें पाटलिपुत्र से इसलिए हारना पड़ा क्योंकि विधायक के क्षेत्र में प्रभाव होने के बावजूद मतदान कम हुआ था।

आरजेडी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी का कहना है कि पार्टी के 144 उम्मीदवार की सूची दिखाती है कि तेजस्वी अब काफी हद तक परिपक्व हो गए हैं। वे कहते हैं, ” मैंने आरजेडी की लिस्ट में तेजस्वी को पहले से ज्यादा परिपक्व पाया है। पार्टी ने समाज के सभी वर्गो को समायोजित करने की कोशिश की है।”

वह कहते हैं, “आरजेडी ने 18 सीटें अति पिछड़े वर्ग यानी ईबीसी को दिए हैं, जिन्हें पिछले कई मौकों पर भुला दिया गया था। वही उच्च जाति को पूरी तरह का से कांग्रेस के हवाले नहीं किया है और इस वर्ग के दर्जनभर उम्मीदवारों को टिकट दी गई है। तेजस्वी ने राजद से शत्रुतापूर्ण विचार रखने वाले वर्गों तक पहुंचने का सच्चा प्रयास किया है, “

वे कहते हैं कि गठबंधन धर्म निभाने में भी तेजस्वी ने काफी परिपक्वता दिखाई है क्योंकि उन्होंने आरएलएसपी, वीआईपी और हम जैसी पार्टियों से पीछा छुड़ाया, जिन्हें लोकसभा में 40 में से 13 सीटें दी गई थी और इनमें से एक भी सीट हासिल नहीं कर पाए और यहां तक कि जिन जातियों के वह अगवा माने जाते हैं उनका भी भरोसा नहीं जीत पाए। इसकी बजाय तेजस्वी ने वामपंथी दलों का साथ लेना ठीक समझा।

वामपंथी दल भले ही हाशिए पर हो, लेकिन उनके कैडर जमीन से जुड़े हैं- उदाहरण के लिए सीपीआई (एमएल) का महादलितों या ईबीसी के बीच एक आधार है, इबीसी यानी दलितों के 21 समुदाय जिन्होंने पिछले चुनाव में नीतीश कुमार को वोट दिया था। तेजस्वी ने यहां तक ​​कि सीपीआई (एमएल) को 40 सीटों की उनकी मांग को 19 तक कम करने में कामयाबी पाई। कुल मिलाकर, वाम दलों को राज्य की 243 में से 29 सीटें मिली हैं।

राजद के लिए कांग्रेस एक अधिक कठिन सहयोगी रही है, क्योंकि कांग्रेस का जमीन पर आधार सिकुड़ रहा है लेकिन पार्टी अपनी हैसियत से ज्यादा सीटें मांगती है। इस बार भी कांग्रेस ने 75 सीटों की मांग की और अकेले जाने की धमकी दी। कांग्रेस के साथ बातचीत का नेतृत्व करने वाले तेजस्वी ने इसे 70 सीटें देने की डील को फाइनल किया।

राजद के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “हम कांग्रेस को छोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकते क्योंकि यह हमारे मुस्लिम मतदाताओं को हमसे छीन सकती है। साथ ही कांग्रेस को छोड़ने से राष्ट्रीय राजनीति में हमारी भूमिका भी कमतर होगी।”

राजद के पुराने रक्षक से निपटना

राजद के उम्मीदवारों की सूची पर एक और नज़र डालने से पता चलता है कि तेजस्वी ने एंटी-इनकंबेंसी से बचने के लिए अब्दुल बारी सिद्दीकी और लालू के करीबी भोला यादव जैसे पुराने गार्ड को स्थानांतरित कर दिया है। उन्होंने सीतामढ़ी जिले के परिहार से राजद के पूर्व राज्य प्रमुख राम चंद्र पुरबे को भी हटा दिया और उनकी जगह दिल्ली में तैनात एक आईआरएस अधिकारी की पत्नी रितु जायसवाल को नियुक्त किया, जो अपने पैतृक गाँव में वापस आईं उन्हें ‘मुखिया’ (हेडवूमन) चुना गया था। ।

हालाँकि, इस सूची में अपराधियों से राजनेताओं की पत्नियाँ शामिल हैं।
एक अन्य राजद नेता ने कहा, “यह एक राजनीतिक मजबूरी है।” उदाहरण के लिए, तेजस्वी को राम सिंह की पत्नी को टिकट देने की आवश्यकता थी, क्योंकि उन्हें अपने ही निर्वाचन क्षेत्र राघोपुर में राजपूत वोटों की जरूरत है, और राम सिंह की वहां कुछ जेबों में प्रभाव है, ”।

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