महामारी में संघ बनाम राज्य क्यों?

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देश में कोरोना से उत्पन्न महामारी चरम पर है। कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या तीस हजार का आंकड़ा छूने के करीब है। अहमदाबाद के म्युनिसिपल कमिश्नर ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि हालात नहीं सुधरे तो मई महीने में कोरोना के साथ साथ मुंह बाए खड़े आर्थिक दुश्वारियों से बुरी तरह आशंकित है। तब ऐसी विकट परिस्थितियों में संघ बनाम राज्य की शर्मनाक राजनीतिक जंग भी छिड़ी हुई है। केंद्र के स्तर पर जहां राज्यों के साथ कई मोर्चे पर संवादहीनता की स्थिति है। वहीं कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री इसे विधानसभा चुनाव के मद्देनजर तूल देने में जुटे हुए हैं। कोरोना के मोर्चे पर जारी जंग के बीच केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच सियासी जंग सतह पर है। कई गैर भाजपाई राज्यों के मुख्यमंत्री केंद्र पर मनमानी का आरोप लगा रहे हैं।
इस महामारी के दौरान जारी शर्मनाक राजनीति पर कई सवाल उठाए जा सकते हैं। हालांकि इससे पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर यह स्थिति आई ही क्यों? क्या केंद्र वाकई राज्यों के साथ बेहतर तालमेल बनाने में नाकाम रहा है। या फिर विभिन्न राजनीतिक परिस्थितियों में गैरभाजपा शासित राज्य अपनी राजनीति चमकाने में जुटे हैं? इस पूरे मामलों की गहन समीक्षा करें तो ये दोनों ही तथ्य सही प्रतीत होते हैं। केंद्र और राज्यों के बीच तालमेल के अभाव के सा इसके पीछे की राजनीति साफ तौर पर झलकती है।
आरोपों-प्रत्यारोपों की इस कड़ी में सबसे शर्मनाक जंग पश्चिम बंगाल सरकार बनाम केंद्र सरकार के बीच चल रही है। केंद्र सरकार का आरोप है कि पश्चिम बंगाल सरकार कोरोना से संबंधित आंकड़े उसके साथ साझा नहीं कर रही। गृह मंत्रालय का कहना है कि आंकड़ों के लिए मंत्रालय की ओर से राज्य सरकार को चार-चार पत्र भेजे गए। राज्य सरकार ने जब इसका कोई जवाब नहीं दिया तब वहां केंद्रीय टीम भेजने का फैसला किया गया। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का आरोप है कि अगले साल विधानसभा चुनाव के मद्देनजर केंद्र की भाजपा सरकार राज्य सरकार को बदनाम करने के एजेंडे पर है। फिर केंद्रीय टीम भेजने के सवाल पर केंद्र ने राज्य सरकार को विश्वास में नहीं लिया।
यहां अहम तथ्य यह है कि राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव है। कोरोना से जारी जंग के बीच केंद्र और राज्य दोनों ही राजनीति पर उतारू हैं। अगर ऐसा नहीं है तो केंद्र को राज्य से संवादहीनता की स्थिति नहीं रखनी थी। जबकि राज्य सरकार को अन्य राज्यों की तरह सहज ढंग से कोरोना के संबंधित आंकड़े उपलब्ध कराने चाहिए थे। इस मामले में विशुद्घ राजनीति इससे भी साबित होती है कि विवाद के बीच भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने राज्य के पार्टी सांसदों के साथ वीडियो कांफ्रेंस के जरिए बैठक कर राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। जबकि केंद्र से दो दो हाथ करने के लिए राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने लॉकडाउन के जारी रहते चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को कोलकाता बुलवा लिया।
इसी मोर्चे पर कांग्रेस शासित राज्य राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्रीय गृह मंत्रालय पर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया। उनका आरोप था कि गृह सचिव कई मामले में लिखित की जगह मौखिक आदेश दे रहे हैं। गौर करने वाली बात यह है कि मध्यप्रदेश की तरह राजस्थान में सत्ता पलटने पर भाजपा की निगाह है। इस खेल में मध्यप्रदेश में भाजपा को ज्योतिरादित्य सिंधिया का साथ मिला तो राजस्थान में उसकी निगाहें उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट पर है। जाहिर तौर पर राजस्थान में भी पश्चिम बंगाल की तरह दोनों ही ओर से जारी आरोपों-प्रत्यारोपों का मुख्य कारण सियासी है। कोरोना के खिलाफ जारी जंग के बीच राज्य में सत्ता बचाने और सरकार गिराने की भी टोह ली जा रही है।
अब मुख्य सवाल संवादहीनता और कई मोर्चे पर उत्पन्न भ्रम से है। खासतौर से लॉकडाउन के दौरान कोटा से छात्रों को बाहर निकालने का मामला हो या मजदूरों को महानगरों से वापस बुलाने का मामला। इन मोर्चों पर केंद्र सरकार के रवैये से संवादहीनता के साथ ही भ्रम की स्थिति पैदा हुई। मसलन लॉकडाउन के दौरान उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश की सरकारों ने कोटा में अध्ययनरत छात्रों को वापस बुलाया। उत्तर प्रदेश ने दिल्ली से बड़ी संख्या में मजदूरों को न सिर्फ वापस बुलाया बल्कि बिहार के कई मजदूरों को राज्य की सीमा पर छोड़ दिया। लॉकडाउन के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले पर केंद्र सरकार चुप रही।
ध्यान देने वाली बात यह है कि कोटा से जिन दो राज्यों उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के छात्रों को लाया गया उन दोनों ही राज्यों में भाजपा की सरकार है। खासतौर से उत्तर प्रदेश सरकार के इस फैसले पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश ने सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जताई। गृह मंत्री और प्रधानमंत्री के समक्ष अपना विरोध जताया। विरोध जताने के बाद भी उत्तर प्रदेश सरकार ने फिर से दिल्ली-हरियाणा में फंसे अपने राज्यों के मजदूरों को लॉकडाउन के दौरान ही वापस बुलाने की घोषणा की। जाहिर तौर पर भाजपा शासित राज्यों के ऐसे फैसलों के कारण केंद्र की भाजपा सरकार विपक्ष के निशाने पर है।
वैसे कोरोना महामारी से साझा लडाई की केंद्र और राज्यो की एकजुटता के बावजूद इस तनातनी की मुख्यम वजह राज्यों को वित्तीय मदद नहीं मिल पाना है। लॉकडाउन की वजह से राज्यों में शराब और पेटरोल-डीजल से आने वाले टैक्सो बंद हो गए हैं। परिवहन सेकटर भी ठप है तो राज्यों को वहां से भी कोई आय नहीं हो रही। इसके बीच राज्यों का जीएसटी का हिस्सा केंद्र उन्हें नहीं दे रहा है। राज्य बीते एक महीने से लगातार जीएसटी का अपना हिस्सा मांग रहे हैं और केंद्र की ओर से अभी तक कोई कदम नहीं उठाया गया है। प्रधानमंत्री के साथ सोमवार को कोरोना पर हुई चौथी बैठक में लगभग सभी मुख्यमंत्रियों ने जीएसटी के अपने हिस्से को रिलीज करने की मांग दोहरायी। सच्चाई यह है कि कोरोना से जमीनी लडाई राज्य लड रहे हैं और उनके बिना यह जंग जीतना असंभव है। कोरोना से मुकाबले के लिए अधिक संसाधन की जरूरत है जबकि लॉकडाउन के चलते आर्थिक तालाबंदी की स्थिति है। ऐसे में राज्यों का खजाना खाली है और वित्तीय संसाधन उन्हें केंद्र ने नहीं दिया तो कोरोना की लडाई कमजोर पड जाएगी। केंद्र सरकार की आर्थिक स्थिति भी मौजूदा हालत में बहुत कठिन है मगर जब मामला राष्टीय आपदा का हो तो संघीय व्यवस्था में केंद्र की जिम्मेमदारी कहीं अधिक है।
निश्चित रूप से विकट और महामारी जैसी स्थिति में देश और समाज की एकजुटता ही काम आती है। मगर हमारी राजनीतिक संस्कृति ने ऐसे कई मौकों पर यह बताया है कि अपने यहां सियासी दलों के लिए सियासत ही पहली प्राथमिकता है। सियासी दलों का यह रवैया साल 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी दिखा तो साल 1962 में चीन-भारत युद्घ के दौरान। तब एक राजनीतिक दल ने तो यहां तक कहा कि हमला चीन ने नहीं बल्कि भारत ने किया है। साल 1975 में देश पर थोपे गए आपातकाल के दौरान भी कुछ दलों ने लोकतंत्र को बचाने के बदले सियासत की रोटी सेंकी थी। आजादी के सात दशक से भी अधिक समय बीतने के बाद भी देश की सियासत का अवसरवादी और शर्मनाक चरित्र नहीं बदला है। दुखद यह है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी मौका पाते ही अवसरवाद की इस सियासत में डूबकी लगाने से परहेज नहीं करती यानि हमाम में सब नंगे हैं। देश की राजनीति का यह अमानवीय चेहरा है। मौजूदा समय ऐसी सियासत करने वालों के चेहरे से नकाब हटाने का है नहीं तो वाकई बहुत देर हो जाएगी।

की लडाई कमजोर पड जाएगी। केंद्र सरकार की आर्थिक स्थिति भी मौजूदा हालत में बहुत कठिन है मगर जब मामला राष्टीय आपदा का हो तो संघीय व्यवस्था में केंद्र की जिम्मेमदारी कहीं अधिक है।

निश्चित रूप से विकट और महामारी जैसी स्थिति में देश और समाज की एकजुटता ही काम आती है। मगर हमारी राजनीतिक संस्कृति ने ऐसे कई मौकों पर यह बताया है कि अपने यहां सियासी दलों के लिए सियासत ही पहली प्राथमिकता है। सियासी दलों का यह रवैया साल 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी दिखा तो साल 1962 में चीन-भारत युद्घ के दौरान। तब एक राजनीतिक दल ने तो यहां तक कहा कि हमला चीन ने नहीं बल्कि भारत ने किया है। साल 1975 में देश पर थोपे गए आपातकाल के दौरान भी कुछ दलों ने लोकतंत्र को बचाने के बदले सियासत की रोटी सेंकी थी। आजादी के सात दशक से भी अधिक समय बीतने के बाद भी देश की सियासत का अवसरवादी और शर्मनाक चरित्र नहीं बदला है। दुखद यह है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी मौका पाते ही अवसरवाद की इस सियासत में डूबकी लगाने से परहेज नहीं करती यानि हमाम में सब नंगे हैं। देश की राजनीति का यह अमानवीय चेहरा है। मौजूदा समय ऐसी सियासत करने वालों के चेहरे से नकाब हटाने का है नहीं तो वाकई बहुत देर हो जाएगी।