मेरे पिता की मौत के पीछे कुछ तो राज है, किसी सरकार ने सामने लाने की कोशिश नहीं की: सुनील शास्त्री

0
232

आज महात्मा गांधी जयंती के अलावा लाल बहादुर शास्त्री जयंती भी है तो इस मौके पर उनके बेटे सुनील शास्त्री ने 1 साल पहले अपने पिता की मौत को लेकर जो अपने मन दुख बताया था आज हमने उसे फिर से सामने लाने की कोशिश की है।

लाल बहादुर शास्त्री के बेटे सुनील शास्त्री ने कहा है, मेरे पिता लाल बहादुर शास्त्री की मौत में कुछ ना कुछ तो राज है। बेटे ने कहा कि इस राज से ‘द ताशकंद फाइल्स फिल्म’ ने पर्दा उठाने की कोशिश की है, जिसे सत्य कहा जा सकता है। लेकिन, ये दुख की बात है कि जिस देश के लिए लाल बहादुर शास्त्री ने इतना सब कुछ किया, वहां उनकी मौत से पर्दा हटाने में किसी की रुचि नहीं है।

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक ने इस पर कुछ नहीं किया।

सुनील शास्त्री ने यह बात करीब 1 साल पहले
देहरादून लिटरेचर फेस्टिवल के ताशकंद फाइल्स सत्र में पहुंचे लाल बहादुर शास्त्री के बेटे सुनील शास्त्री ने कुछ इस तरह अपने मन की बात सबके सामने रखी।

सुनील शास्त्री ने कहा कि मैं जहां भी जाता हूं, मेरे पिता की मृत्यु कैसे हुई? ये पूछा जाता है, लेकिन मैं खुद को इस पर बहुत शर्मिंदा होता हूं कि मुझे खुद नहीं पता चल पाया कि वास्तव में उनके साथ क्या हुआ था। उन्हें जहर दिया गया था, यह बात कहते-कहते मेरी माता जी चली गईं लेकिन तत्कालीन सरकार ने इसकी जांच में कोई रुचि नहीं दिखाई।

ताशकंद में क्या हुआ था?

जनवरी 1966 को सोवियत रूस ने भारत-पाक में समझौते के इरादे से ताशकंद में एक सम्मलेन बुलाया। पाकिस्तान की तरफ से जनरल अयूब खान और शास्त्री ने ताशकंद समझौते पर दस्तखत किए। इसके मुताबिक दोनों पक्ष युद्ध से पहले की स्थिति में लौटने को तैयार हो गए। ताशकंद सम्मेलन खत्म तो हुआ, लेकिन देश के लिए गम की बहुत बड़ी खबर के साथ. 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में ही लालबहादुर शास्त्री ने आखिरी सांस ली।

कुलदीप नैयर की किताब में उस ‘रात का’ पूरा जिक्र?

शास्त्री जी के प्रेस सचिव और उनके करीबी रहे मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर अपनी किताब बियॉन्ड द लाइंस में उस रात का पूरा ब्योरा बताते हैं. नैयर शास्त्री के मौत के वक्त ताशकंद में ही थे।

कुलदीप नैयर लिखते हैं,

उस रात न जाने क्यों मुझे शास्त्री की मौत का पूर्वाभास हो गया था. किसी ने मेरे दरवाजे पर दस्तक दी तो मैं शास्त्री की मौत का ही सपना देख रहा था. मैं हड़बड़ाकर उठा और दरवाजे की तरफ लपका. बाहर कॉरिडोर में खड़ी एक महिला ने मुझे बताया, “आपके प्रधानमंत्री मर रहे हैं.”

बियॉन्ड द लाइंस, मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर की किताब से
शास्त्री जी के निधन के वक्त उनके कमरे की हालत के बारे में नैयर कुछ इस तरह बताते हैं

शास्त्री जी का कमरा एक बड़ा कमरा था.उतने ही विशाल पलंग पर शास्त्री की निर्जीव देह दिख रही थी. पास ही कालीन पर बड़ी तरतीब से उनके स्लीपर पड़े हुए थे. उन्होनें इन्हें नहीं पहना था. कमरे के एक कोने में पड़ी ड्रेसिंग टेबल पर एक थरमस लुढ़का पड़ा था. ऐसा लगता था कि शास्त्री जी ने इसे खोलने की कोशिश की थी. कमरे में कोई घंटी नहीं थी.
बियॉन्ड द लाइंस, मशहूर पत्रकार कुलदीप

नैयर की किताब से

ये सब रात करीब 2 बजे की बात है.दुनिया को यही बताया गया कि शास्त्री की जी मौत हार्ट अटैक से हुई थी.

कमरे में न घंटी, न फोन!

शास्त्रीजी की मौत के रहस्य में एक घंटी का भी जिक्र होता है..शास्त्री जी के बेटे अनिल शास्त्री भी एक न्यूज चैनल से बातचीत में कहते दिखे थे कि लाल बहादुर शास्त्री के कमरे में न तो घंटी थी, न टेलीफोन था..डॉक्टर का कमरा भी दूर था…अनिल शास्त्री का कहना है कि ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री को रहने को लेकर लापरवाही बरती गई. शास्त्रीजी का थर्मस भी साथ में नहीं आया. उनकी बाकी हर चीज साथ में आई जैसे टोपी, शेविंग कीट लेकिन थर्मस उनके साथ नहीं आया. इस पर भी सवाल उठते हैं.

शरीर पर चीरे-नीले रंग का रहस्य

मौत पर कुछ और सवाल उठते हैं, जैसे कुलदीप नैयर अपनी किताब में लिखते हैं, कि जब वो ताशकंद से वापस लौटे तो शास्त्रीजी की पत्नी ललिता शास्त्री ने पूछा कि लाल बहादुर शास्त्री का शरीर नीला क्यों पड़ गया था…नैयर ने कहा था अगर शरीर पर लेप किया जाता है तो वो नीला पड़ जाता है. इसके बाद भी ललिता शास्त्री के सवाल कम नहीं हुए उन्होंने फिर पूछा कि शरीर पर चीरों के निशान कैसे हैं..नैयर लिखते हैं कि ये सुनकर वो चौंक गए क्योंकि ताशकंद या दिल्ली में शास्त्री के शरीर का पोस्टमार्टम तो किया ही नहीं गया था.

लाल बहादुर शास्त्री के बेटे अनिल शास्त्री भी कहते हैं कि उनका चेहरा नीला था और माथे पर दाग था. अनिल बताते हैं कि उस वक्त उनकी मां ने कुछ डाक्टरों से बातचीत की थी और उनका भी कहना था कि हार्ट अटैक के मामले में दाग नहीं होना चाहिए.अनिल शास्त्री का कहना है कि इन सब चीजों से संदेह तो होना ही था.
खाना किसी और ने क्यों बनाया?
जो संदेह लगातार उठ रहे थे वो आरोप तब बने जब 2 अक्टूबर 1970 को शास्त्रीजी के जन्मदिन के मौके पर, ललिता शास्त्री ने खुलेआम अपने पति की मौत की जांच कराने की मांग कर दी…कुलदीप नैयर लिखते हैं कि शास्त्रीजी के परिवार को शायद ये बात भी नहीं जम रही थी कि शास्त्री का खाना उनके निजी सेवक रामनाथ की बजाय टी.एन.कौल के बावर्ची जां मुहम्मदी ने क्यों बनाया था.

हालांकि, कुलदीप नैयर ये साफ करते हैं कि उन्हें ये आरोप थोड़ा अजीब लगा था क्योंकि लाल बहादुर शास्त्री जब 1965 में मास्को गए थे तब भी उनका खाना जां मुहम्मदी ही बना रहे थे।