मोदी को क्यों नहीं याद आए आडवाणी?

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अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की शुरुआत के लिए भूमि पूजन कार्यक्रम आज संपन्न हो गया। जब मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ, तब इसके लिए संघर्ष करने वाले इक्का-दुक्का लोग ही वहां नजर आए। मसलन महंत नृत्यगोपाल दास, चंपत राय और साध्वी ऋतंभरा। मंदिर आंदोलन को जमीन पर उतारने वालोंं में शामिल कई प्रमुख चेहरे इस दौरान परलोक के वासी हो गए। जो बचे वे भुला दिए गए। समारोह के मुख्य अतिथि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उस लालकृष्ण आडवाणी की याद तक नहीं आई, जिनकी रथ यात्रा के वह सारथी थे। यही नहीं उन्होंने उस दौरान दिए गए जय श्री राम के नारे को भी जय सिया राम से बदल दिया।
हां, इस दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत को जरूर लालकृष्ण आडवाणी की याद आई, मगर इस पूरे कार्यक्रम में आंदोलन का कभी सशक्त चेहरा रहे मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती जैसी शख्सित का किसी ने जिक्र करना तक मुनासिब नहीं समझा। संघ प्रमुख ने आडवाणी को याद तो किया मगर उन्हें कार्यक्रम में न बुलाने की एक तरह से न सिर्फ सफाई दी, बल्कि कोरोना महामारी के बहाने उन्हें ना बुलाने के फैसले पर एक तरह से अपनी सहमति की मुहर भी लगा दी। सवाल है कि प्रधानमंत्री मोदी को लालकृष्ण आडवाणी की याद क्यों नहीं आई? उस आडवाणी की जिनकी साल 1990 की सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा के दौरान मोदी सारथी की भूमिका में थे। इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमें प्रधानमंत्री की राजनीतिक कार्यशैली पर निगाह दौड़ाना होगा। उनकी राजनीति वन मैन शो की राजनीति है। उनकी राजनीति का अपना एक अलग स्टाइल है। वह उन महफिलों से दूर रहते हैं जिसके केंद्र में वह खुद नहीं होते। गुजरात के सीएम से ले कर प्रधानमंत्री बनने तक के सफर के करीब दो दशक के सफर में इसकी अनुभूति कई बार हुई है।
मसलन राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन का ही मामला लीजिये। इस कार्यक्रम में विपक्ष तो दूर मोदी सरकार के एक भी मंत्री तो न्योता नहीं मिला। कोरोना और उम्र के बहाने आडवाणी और जोशी किनारे कर दिए गए। खासतौर पर अगर इस महफिल में राम मंदिर के सूत्रधार आडवाणी होते तो लोगों की निगाहें उनकी ओर भी घूमती। तर्क देने वाले कोरोना और उम्र का हवाला की थोथी दलील देंगे। थोली दलील इसलिए कि कोरोना की गाइडलाइन की माने तो न तो संघ प्रमुख और न ही प्रधामनंत्री नरेंद्र मोदी इस कार्यक्रम में शरीक हो सकते थे। सरकार की गाइडलाइन में 60 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति को घर में ही रहने की सलाह है। इस मापदंड के हिसाब से प्रधानमंत्री और संघ प्रमुख दोनों की उम्र 60 से ज्यादा है। इसके इतर यह भी कि खुद सरकार की गाइडलाइन कहती है कि कोरोना संक्रमित के संपर्क में आने वाले लोगोंं को आइसोलेशन में जाना चाहिए। अभी गृह मंत्री अमित शाह, पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान कोरोना पॉजिटिव हैं। इन दोनों मंत्रियों ने बुधवार की कैबिनेट की बैठक में हिस्सा लिया था जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं।
जाहिर तौर पर सवाल श्रेय लेने का है। और श्रेय मेंं हिस्सेदारी प्रधानमंत्री की फितरत में नहीं है। चीन से तनाव के बीच प्रधानमंत्री की लद्दाख यात्रा को ही लीजिये। जाना था रक्षा मंत्री को मगर गए प्रधानमंत्री वह भी अकेले। चाहते तो रक्षा मंत्री को साथ ले जा सकते थे। मगर ऐसा नहीं ंकिया। पिछले कार्यकाल में जब अमेरिका गए तब विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पूरे दृश्य में कहीं नहीं थी। ह्यïूस्टन की हाउ डी मोदी कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी खुद ही महफिल का दूल्हा बने रहे। इसके बाद दूसरे कार्यकाल में जब डोनाल्ड ट्रंप भारत आए तो अहमदाबाद के कार्यक्रम मेंं यही स्थिति रही। पहले कार्यकाल में पूरे दृश्य से तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज गायब थीं तो दूसरे कार्यकाल में विदेश मंत्री एस जयशंकर। पहले कार्यकाल में चीनी राष्टï्रपति शी जिनपिंग के भारत दौरे के दौरान भी बस प्रधानमंत्री मोदी ही वन मैन शो थे। इसी प्रकार पहले कार्यकाल में चर्चित और बेहद विवादित रहे फ्रांस के साथ राफेल सौदा समझौता मामले में भी विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री की कहीं कोई भूमिका ही नहीं थी।
ऐसे में भूमि पूजन कार्यक्रम में प्रधानमंत्री को अपने रथी आडवाणी की याद ना आना और जय श्री राम की जगह जय सिया राम का नारा देना अपने आप सारी कहानी बयां कर देती है। यह नया इतिहास लिखने की कोशिश है। ऐसा इतिहास लिखने की कोशिश जहां सिर्फ मैं ही मैं दिखे। मगर ऐसा करने वाले इतिहास के कुछ साल पुराने पन्ने को उलटना नहीं चाहते। आडवाणी ने राम मंदिर आंदोलन में जय श्री राम का नारा दिया था। उससे पहले भारतीय संस्कृति में एक दूसरे के अभिवादन के लिए आम तौर पर लोग जय राम जी की या राम-राम का इस्तेमाल करते थे। अभिवादन के इस चरित्र को बदलने के लिए जय श्री राम का इस्तेमाल हुआ। जिसमें एक तरह की गैरजरूरी उग्रता थी। मगर यह अभिवादन का तरीका धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रहा था। जाहिर तौर पर यह लोकप्रियता मंदिर आंदोलन के पुराने दौर और पुराने नायकों की याद दिला रही थी। जय सिया राम अब जय श्री राम को किनारे करने की रणनीति का हिस्सा है। मतलब आडवाणी या उनके जैसे प्रमुख चेहरे ही नहीं बल्कि उनके नारे से भी किनारा करने का सिलसिला शुरू हो गया है।
बहरहाल यह मंदिर आंदोलन का नया इतिहास लिखने की कवायद है। नए इतिहास में आंदोलन के असली नायकों की भूमिका की अनदेखी ही नहीं उन्हें भुलाने की तैयारी दिख रही है। नए सिरे से लिखे जा रहे इतिहास में कृत्रिम नायकों को असली नायक बताने की कलाबाजी हो रही है। वैसे यह सच भी है कि इतिहास राजाओं का होता है। क्योंकि इतिहास राजा की निगाह से ही लिपिबद्घ होता है। मगर ऐसा करने वाले भूल जाते हैं कि यह आधुनिक समय है। यहां एकलव्य, शंबुक वध मामले में द्रोणाचाय और भगवान राम भी विवेचना के दौरान सवालों के घेरे में आते हैं। यह सच है कि पूरा विपक्ष इस मामले में मौन धारण किए हुए है। खुद किनारे कर दिए गए आडवाणी, जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती जैसे मंदिर आंदोलन के बड़े चेहरे मौन हैं। मगर इतिहास कभी मौन नहींं रहता। इतिहास समय और परिस्थिति का इंतजार करता है। अभी नहीं तो कभी राम मंदिर आंदोलन पर इतिहास बोलेगा। जब बोलेगा तो कृत्रिम नायक और कृत्रिम पटकथा को धराशाई ही होना है। ठीक उसी तरह जैसे राम-राम, जय राम जी की जगह जय श्री राम की विदाई की पटकथा लिखी जा रही है। उसी तरह जय सिया राम की पटकथा का भी यही इतिहास वर्तमान के सहारे मर्सिया पढ़ेगा।