सिद्दीक के गढ़ में जाकर पता किया कि मुसलमानों के सभी वोट ममता को मिलेंगे या नहीं ?

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बंगाल की 30 फीसदी आबादी एकजुट होकर ममता बनर्जी को वोट देती है तो उन्हें फिर सीएम बनने से पीएम मोदी नहीं रोक सकते। लेकिन बंगाल के फूरफुरा शरीफ दरगाह के पीरजादा अब्बास सिद्दीक ने इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) के नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली है। वह वामपंथी और कांग्रेस के गठबंधन का हिस्सा भी बन गए हैं और ममता बनर्जी को कड़ी चुनौती दे रहे हैं। आई एस एफ की वजह से ही मुस्लिम वोटों का बंटवारा होने की बात कही जा रही है।

असल सवाल यह है कि क्या अब्बास सिद्धीक में इतना दम है कि वह बंगाल की 30% मुस्लिम आबादी को प्रभावित कर सकते हैं। दरअसल अब्बास सिद्दीकी अपने इलाके और बंगाल में पिछले कुछ समय से काफी मशहूर रहे हैं और वह फुर्फूरा शरीफ दरगाह के पीरजादा हैं।

फुर्फूरा शरीफ में हजरत अबू बकर सिद्दीक और उनके पांच बेटों की मजार है वह अपने वक्त के सबसे बड़े समाज धर्म सुधारक माने गए थे। उनकी याद में हर साल उर्स का आयोजन होता है इसमें लाखों श्रद्धालु जुटते हैं इसमें अच्छी खासी तादाद गैर मुस्लिमों की भी होती है। इस दरगाह के जो पीरजादा होते हैं वह हजरत अबू बकर सिद्दीक के ही वंश के माने जाते हैं। पीरज़ादा का अर्थ होता है पीर यानी संत और ज्यादा का मतलब पुत्र यानी पीर के वंशज होने की वजह से दरगाह के प्रति आस्था रखने वालों के बीच बहुत ही सम्मान होता है, इसलिए माना जाता है कि गरीब मुसलमानों पर अब्बास सिद्दीक का ज्यादा असर हो सकता है क्योंकि शरीफ के पीरज़ादा जो कहते हैं उनका आदेश मुस्लिम सिर आंखों पर रखते हैं।

हालांकि मुस्लिमों की दो श्रेणी मानी जाती है एक बिल्कुल गरीब जिनके लिए पीरों का कहा आदेश से कम नहीं होता है। दूसरी श्रेणी उन मुसलमानों की हैं जो अपने पैरों का सम्मान तो करते हैं लेकिन वोट देने के मामले में वह अपने निर्णय को अहम मानते हैं। यही कारण है कि जब फुर्फूरा शरीफ का हमने दौरा किया तो पाया कि मुसलमानों के बीच 2 तरह के विचार अभी तैर रहे हैं। जो गरीब मुस्लिम वर्ग है वह सिद्दीक के लिए जान देने के लिए भी तैयार है।

फुरफुरा शरीफ इलाके में ज्यादातर सिद्दीक को भाईजान के नाम से पुकारते हैं। सड़क पर कई गरीब वर्ग के मुसलमानों ने कहा कि वह उनके लिए जान भी देने के लिए तैयार हैं और वह तो बहुत छोटी सी चीज है। वही सिद्दीक के खुद के चाचा उनके खिलाफ हैं। वह कहते हैं कि दरगाह में हर धर्म और वर्ग के लोग आते हैं अगर दरगाह का पीरजादा ही किसी एक पार्टी को समर्थन कर देगा तो क्या दरगाह पर सवाल नहीं उठेगा।

बंगाल के कई संपन्न और पढ़े-लिखे मुसलमान केवल वर्ग के लोग टीएमसी की तरफ ज्यादा आकर्षित दिख रहे हैं और भाजपा को रोकने के लिए ममता बनर्जी को ही एकमात्र विकल्प मान रहे हैं उनका मानना है कि पीरजादा का वह सम्मान करते हैं लेकिन जिस तरीके से उन्होंने राजनीति की चादर ओढ़ ली है और कमजोर माने जाने वाले लेफ्ट और कांग्रेस के साथ हाथ मिला लिया है उससे वह सहमत नहीं है और ममता बनर्जी को वोट देना चाहते हैं ताकि भाजपा को रोका जा सके।