सोनिया गांधी का आर्टिकल: मनरेगा की अहमियत ना चाहते हुए भी अहसास!

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कोरोनावायरस संकट और आर्थिक मंदी की वजह से देश पर छाए संकट के बीच कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मनरेगा पर एक आर्टिकल के जरिए मोदी सरकार की नीतियों पर वार किया है। सोनिया गांधी ने बताया कि देर से ही सही न चाहते हुए भी मनरेगा की अहमियत का अहसास केंद्र सरकार हुआ। इसलिए सरकार देश पर छाए संकट का सामना करे न कि राजनीति करे। यह वक्त भाजपा बनाम कांग्रेस का नहीं। आपके पास एक शक्तिशाली तंत्र है। इसका उपयोग कर आपदा के इस वक्त में भारत के नागरिकों की मदद कीजिए।

सोनिया गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री का पद संभालने के 6 साल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी समझ आया कि मनरेगा को बंद किया जाना व्यवहारिक फैसला नहीं था। उन्होंने इस योजना को लेकर आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग कर कांग्रेस पार्टी पर हमला बोला। इतना ही नहीं इस योजना को कांग्रेस पार्टी की विफलता का एक जीवित स्मारक भी कहा। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने मनरेगा को खत्म करने, खोखला करने व कमजोर करने की पूरी कोशिश की। लेकिन मनरेगा ने अपनी अहमियत साबित की। अब सरकार को पीछे हटने को मजबूर होना पड़ा।

उन्होंने कहा कि सरकार की नीतियों से निराश प्रवासी कामगार देश के विभिन्न शहरों से अपने गांव लौट रहे हैं। उनके पास न तो रोजगार है और न ही एक सुरक्षित भविष्य। इसलिए मनरेगा की जरूरत पहले से कहीं और ज्यादा है। केंद्र सरकार इन मेहनतकशों का विश्वास हासिल करे और राहत कार्य उन्हीं को केंद्र में रखकर शुरू करे।

संकट की इस घड़ी में मोदी सरकार का सबसे पहला काम मनरेगा का जॉब कार्ड गरीब मजदूरों को जारी करने की होनी चाहिए। राजीव गांधी ने जिस पंचायती राज तंत्र को सशक्त बनाने के लिए मनरेगा को लागू किया आज उन्हीं पंचायातों को ग्रामीण विकास में अहम भूमिका निभाने का मौका दिया जाना चाहिए।
यह कोई केंद्रीकृत कार्यक्रम नहीं है। जन कल्याण की योजनाएं चलाने के लिए पंचायतों को और मजबूत किया जाए तथा प्राथमिकता से पैसा पंचायतों को दिया जाए। ग्राम सभा यह निर्धारित करे कि किस प्रकार का काम किया जाए। ऐसा इसलिए कि स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधि ही जमीनी हकीकत और श्रमिकों की जरूरतों को समझते हैं। श्रमिकों के कौशल का उपयोग ऐसी टिकाऊ संरचनाओं के निर्माण के लिए किया जाना चाहिए, जिनसे कृषि उत्पादकता में सुधार हो, ग्रामीण आय में वृद्धि हो तथा पर्यावरण की रक्षा हो।

केंद्र सरकार को पैसा सीधा लोगों के हाथों में पहुंचाना चाहिए। सभी प्रकारक की बकाया राशि, बेरोजगारी भत्ता व श्रमिकों का भुगतान लचीले तरीके से बगैर देरी के करना चाहिए। मोदी सरकार मनरेगा के तहत कार्यदिवसों की संख्या बढ़ाकर 200 करने तथा कार्यस्थल पर ही पंजीकरण कराने की अनुमति देने की मांग पर अमल करे। ऐसा इसलिए कि मनरेगा पूरी दुनिया में गरीबी उन्मूलन का बेस्ट मॉडल है।

आखिर, क्या है मनरेगा?

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून, 2005 (मनरेगा) क्रांतिकारी परिवर्तन का जीता जागता उदाहरण है। यह क्रांतिकारी बदलाव का *** इसलिए है क्योंकि इस कानून ने गरीब से गरीब व्यक्ति के हाथों को काम व आर्थिक ताकत दे भूख व गरीबी पर प्रहार किया। इस योजना के तहत पैसा सीधे उन लोगों के हाथों में पहुंचाता है जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।

सोनिया गांधी आर्टिकल में लिखा है कि कोविड-19 महामारी और इससे उत्पन्न आर्थिक संकट मोदी सरकार को सच का अहसास करवाया है। पहले से ही चल रहे अभूतपूर्व आर्थिक संकट व मंदी की मार झेल रही अर्थव्यवस्था ने सरकार को आभास दिलाया कि पिछली यूपीए सरकार के फ्लैगशिप ग्रामीण राहत कार्यक्रमों को दोबारा शुरू करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल में ही मनरेगा का बजट बढ़ा एक लाख करोड़ रु. से ज्यादा का कुल आवंटन किए जाने की घोषणा ने इस बात को साबित कर दिया है। अकेले मई, 2020 में ही 2.19 करोड़ परिवारों ने इस कानून के तहत काम की मांग की जो आठ सालों में सबसे ज्यादा है।